स्त्रीविहीन सृष्टि
सृष्टि का मूल सिद्धांत आधार और आधेय है ; कारण-कर्म-परिणाम है । क्षुद्र जीव अस्तित्व रक्षण के लिए स्वयं से अधिक महत अस्तित्व पर निर्भर करते हैं । अभाव की स्थिति में , सभाव विनय विनती , स्तुति करते हैं । स्त्री विहीन सृष्टि में सभी अपने - अपने पूज्यों , ईष्टों , गुरुओं का स्मरण कर प्रार्थना कर रहे थे जो अंततः त्रिदेवों के लोकों में संग्रहित हो रही थीं .. दैन्य दारुण्य मयी । सभी ब्रह्माण्डों के ब्रह्मा , विष्णु , शिव व्यथित हो कर हरि से गुहार लगाने लगे । अपनी - अपनी शेष शक्ति से वे सब हरि की शरण पहुंचे । गोलोक में न मैं थी न कोई गोपिका , सृष्टि में स्त्री के लुप...