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स्त्रीविहीन सृष्टि

                                सृष्टि का मूल सिद्धांत आधार और आधेय है ; कारण-कर्म-परिणाम है ।   क्षुद्र जीव अस्तित्व रक्षण के लिए स्वयं से अधिक महत अस्तित्व पर निर्भर करते हैं ।   अभाव की स्थिति में , सभाव विनय विनती , स्तुति करते हैं ।   स्त्री विहीन सृष्टि में सभी अपने - अपने पूज्यों , ईष्टों , गुरुओं का स्मरण कर प्रार्थना कर रहे थे जो अंततः त्रिदेवों के लोकों में संग्रहित हो रही थीं .. दैन्य दारुण्य मयी । सभी ब्रह्माण्डों के ब्रह्मा , विष्णु , शिव व्यथित हो कर हरि से गुहार लगाने लगे ।   अपनी - अपनी शेष   शक्ति से वे सब हरि की शरण पहुंचे ।                                    गोलोक में न मैं थी न कोई गोपिका , सृष्टि में स्त्री के लुप...

गोपी तुलसी

                                       एक बार गोपी तुलसी के प्रेम में बिद्ध श्रीकृष्ण को देख कर कर मैंने क्रोधवश अपने को अन्तर्हित कर लिया । गोलोक अनंत सृष्टियों का केंद्र बिंदु है न ! इसी लोक का प्रकाश अन्य सृष्टियों को स्थिर रखता है ..चेतन रखता है .. पदार्थ से निर्मित सृष्टियों का आधार प्रकाश ही है..जो कुछ यहाँ घटता है उसका प्रभाव पदार्थिक सृष्टियों पर स्वतः ही होने लगता है । गोलोक के स्त्री विहीन होते ही   समस्त सृष्टियाँ स्त्री विहीन हो गयीं । मेरी कला से उत्पन्न सभी देवियां और स्त्रियां मेरे योग बल से मुझ में समाविष्ट हो गयीं..   सभी ब्रह्माण्डों में देवगण , ऋषि गण , मानवगण   स्त्री विहीन हो जाने से कोलाहल करने लगे ..पुरुष वर्ग का छद्म अभिमान शुष्क , निष्प्राण पल्लवों   की भांति बुद्धि से विलग हो कर झर गया । हाहाकार मच गया.. शिशु , युवा और वृद्ध सभी का अस्तित्व...